प्रेम की पूजा

कभी-कभी शब्द प्रार्थना बन जाते हैं, और प्रार्थना प्रेम में बदल जाती है। यह केवल ईश्वर को पुकारने का प्रयास नहीं, बल्कि स्वयं को उनके प्रेम में समर्पित कर देने की एक गहरी आकांक्षा है। यह लेख उसी भावना का विस्तार है—जहाँ पूजा और प्रेम एक ही हो जाते हैं।

साहित्य

4/15/20261 min read

प्रेम तेरी पूजा करना चाहता हूँ,
पूजा तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ।
संग जीना चाहता हूँ, संग मरना चाहता हूँ।
डरता हूँ कि कहीं खो न जाऊँ।
यह दुनिया एक भूल-भुलैया है—ऐ ज़िंदगी,
तेरी उंगली पकड़ कर चलना चाहता हूँ।

परमात्मा, तेरी पूजा करना चाहता हूँ,
पूजा तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ।
हृदय मेरा मंदिर है,
अपनी प्रियतमा को पुष्प अर्पित करना चाहता हूँ।
प्रेम तेरी पूजा करना चाहता हूँ,
पूजा तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ।

ममता मय तू,
करुणा मय तू—मैं अज्ञानी,
विद्या मय तू।
तू किसी की पुत्री है,
तू किसी की बहना है,
तू किसी की प्रेमिका है,
तू किसी की पत्नी है,
तू किसी की माता है।

हे विधाता,
तेरे दर पर सिर झुकाना चाहता हूँ।
प्रेम तेरी पूजा करना चाहता हूँ,
संग जीना चाहता हूँ,
संग मरना चाहता हूँ।

✍️ लेखक:

Rajesh Kumar Karmpathi (उर्फ सम्राट शैदा सुल्तानपुरी)