कविता
कबाड़ी वाला
साहित्य
संपादक
6/22/20261 min read


कविता -- कबाड़ी वाला---- बचपन की बाते क्या लिखूँ,, जवानी की बाते क्या लिखूँ,, सब कुछ वैसे का वैसे ही है,,, कुछ नहीं बदला,,, बदले है तो,,, सिर्फ शासक,,, सियासत दार,,, चाहे,,, सतयुग रहा हो,,, चाहे त्रेता रहा हो,,, चाहे द्वापर रहा हो,,, और चाहे कलयुग ही हो,,,,,सब कुछ वैसे का वैसा,,, राजा - प्रजा,,, ऊँच -- नीच,,, अमीर -- ग़रीब,,, कुछ तो नहीं बदला,,, एक गरीब का बेटा,,एक मजदूर का बेटा,, मजदूर ही बनता है,,, और यदि एक प्रतिशत कुछ बनता है,, तो वो बनता है नौकर ,,,, हा जी नौकर,,, नौकर तो नौकर होता है,, चाहे वो प्रथम श्रेणी का हो या फ़िर चतुर्थ श्रेणी का हो,,, ,, हा भैया नौकर तो नौकर होता है,,,------- हा मै कबाड़ी वाला हूँ,, दिन भर कचरा से बोतल,,, काँच तलाश कर,, मुश्किल से दो वक़्त की रोटी अपने बच्चों को खिला पाता हूँ,,, अपने बच्चों को कौन सी शिक्षा दूँगा,,,आप कह सकते हैं,,, सरकारी स्कूल तो है,,, हा जरूर है साहब,,,मै अपने बच्चों को उत्तर - प्रदेश के सरकारी स्कूल में भेजता हूँ,,, मेरा एक बच्चा कक्षा तीन में तो दूसरा बच्चा कक्षा पांच में है,,,अभी आ से अ हा तक़ नहीं आता,,, उत्तर प्रदेश ही नहीं,, पूरे भारत में अमीरों के लिये अलग शिक्षा की व्यवस्था है,,,और गरीबों के लिये अलग शिक्षा की व्यवस्था है,,,,का करे साहब,,, हम तो शूद है,, मेरे बाप दादा,,, ग़रीबी में एड़ी रगड़ रगड़ के मर गए,,, हमहू मर रहे,,,, हमार बेटवा ऐसे मर जाई साहब,,,मर जाई साहब,,,,,,,,,, संपादक
