मज़ा

वियोग+ संयोग रस

साहित्य

संपादक

5/14/20261 min read

छंद मुक्त कविता --- मज़ा ----------------------- किसी ने किसी के इश्क़ में,,, ताजमहल बना दिया,,,, मगर मैं तेरे इश्क़ में नया जहां बना दूंगा,,, ये धरती भी तेरी है,,,।। और ये चांद भी तेरा है,,।। मगर तेरे लिए दुनियां,,,,, मैं कहां बना दूंगा,,,, बस इक दिल ही है मेरा,,,,, कहो तो ,,, तेरे लिए इसको सजा बना दूँगा,,,,।।। वीरान हैं आँखें,,, वीरान है दिल की दुनियां,,, वीरान जिन्दगी है मेरी,, ,,।।। काश कोई हँसी दिल चाहता मुझको,,, काश किसी का मै इश्क़ होता,,,,।।।। ये जिन्दगी,,, तुझे,,, जीना चाहता हूँ।। बस तेरी मोहब्बत चाहिए मुझे,,,।। ए जिन्दगी,,, तुझे पीना चहता हूँ।। बस तेरी इजाज़त चाहिए मुझे,,,।।। बड़ी तपिश है,, जिन्दगी में,,,।। ए बरसने वाले बादल,,, बरस जाओ, जिन्दगी में,,, बस इस जिन्दगी को राहत चाहिए,,,।।। बस इक तेरी कमी है ,,,।। वरना जिन्दगी जीने में मज़ा आ जाए,,।। तेरी मज़बूरी है कि,, तू मुझे मिल नहीं सकती,,।। मेरी मज़बूरी है कि तुझे,, मै पा नहीं सकता।।।,,,,,,, संपादक

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राजेश कुमार कर्मपथी उर्फ़ सम्राट शैदा सुलतान पूरी

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