क्या यही जिन्दगी है---

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साहित्य

संपादक

4/29/20261 min read

छंद मुक्त कविता -- क्या यही जिन्दगी हैं -- दिल की बड़ी तमन्ना थी,,, कि तेरे माथे की बिंदिया बनूं,,,तेरे आंखों का काजल बनूं,,,तेरे होठों की लाली बनूं,,, मगर कमबख्त वक्त ने तेरे पैरों का पायल बना दिया,,,तेरे प्यार में पागल बना दिया,, दर्द ए दिल ने घायल बना दिया,,,अब मैं क्या हूँ,, । मुझे ख़ुद नहीं पता,,।।। किसी के रास्ते का पत्थर तो ,,,,,, किसी के रास्ते का कांटा,,, लोग मिलते गए ,,, और मुझे अपने अपने रास्ते से हटाते गए,,, मैं बेबस लाचार,,, अपने कर्म दण्ड को कोसता रहा,,, एकांत में पड़ा,,, बोझिल सी जिन्दगी जीता रहा,,, और सोचता रहा --- क्या यहीं जिन्दगी है,,,।।।।।

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राजेश कुमार कर्मपथी उर्फ़ सम्राट शैदा सुलतान पूरी

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