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साहित्य
4/23/20261 min read
छंद मुक्त कविता --बरसात----राते, बरसात की रातें ,,,, छप्पर में टपकते, बारिश की बूंदें,,, कहते हैं ,,, मेरे असफलता की कहानी,,, दुनियां कहां से कहां पहुंच गई,,, मै वही का वही रह गया,,, बादल आज,, बरस कर,,, निकल,, जाए तो,,,, बाजार से,, बरसाती लाकर,,, छप्पर पे डाल दूँगा,,,, अबकी साल तो निकल ही जायेगा । ,, अगले साल देखा जाएगा,,, हर साल,,, मै इसी तरह ,,, देखता रहता हूं,,,,, मात्र एक बीघा खेत,,, जुताई। ,,, बीज ,, खेत में धान की रोपाई ,,, रासायनिक उर्वरक,,, कीटनाशक दवाएं ,,, ,, ट्यूबल का पानी ,,, बाप रे बाप,,,,,।।। कुल लागत बराबर कुल लाभ ,,,, मैं वहीं का वही हूँ,,, ए मेघा ,,, तू जमके बरसना,,, भले ही मेरा छप्पर ,,, सदा टपकता रहे ,,,, वरना मेरे बच्चे ,,, भूखे। मर जायेंगे। ,,, ए बरसात की बूंदें ,,, तू मेरे लिए,, हीरे- मोती हैं ,,,तेरी कीमत ,, मेरे जैसे,,, ग़रीब किसान,, बख़ूबी जानते हैं,,,,,,,।।।।
