चकना चूर बना डाला
कोहिनूर बना डाला
साहित्य
संपादक
5/11/20261 min read


छंद मुक्त कविता -- चकनाचूर बना डाला --- मेरे इश्क़ ने तुझे,, कोहिनूर बना डाला,,, कोहिनूर तुझे,,, जन्नत की हूर बना डाला,,,।। मेरे दिल की बचपना तू,, मेरे दिल की जवानी तू,, जानम,, तुझको क्या मालूम,, प्रेम की आज निशानी तू,, दिल ने तुझे,,, नयनों का शबनूर बना डाला,,।। मेरे इश्क ने तुझे,,, कोहिनूर बना डाला।। मै जो खाऊं ,, चूल्हे की रोटी तू,, हुस्न ने मुझे,, आज चूल्हे की लकड़ी बना दिया,,।। तुम इतनी स्वप्नीली हो,, कि अपने जाल में फंसाता हूँ,,।। तूने मुझे मकड़ी बना दिया,,।। कर्म की रोटी,,, तंदूर बना डाला,,, मेरे इश्क ने तुझे,, कोहिनूर बना डाला।। काबिलो की ये दुनियां है,,।। और चमचों की ये दुनियां है।। नाकाबिल शख़्स,, मजदूर बना डाला,,।। मेरे इश्क ने तुझे कोहिनूर बना डाला,,।। न्याय क्या है,, अन्याय क्या है,, सब देखती है,, मेरी आँखें,, धर्म क्या है,, अधर्म क्या है,,, सब देखती हैं,, मेरी आँखें,,।। मगर खुद को सूर,,, और मजबूर बना डाला,,, उसके मोबाइल में डाटा नहीं है,,उसका मोबाइल एक खिलौना है,,।। मेरे मोबाइल मे डाटा है,, मगर फ़िर भी,, बिना चैटिंग के एक खिलौना हैं,,, वक़्त ने ख़ूब मुझे,,, चकना चूर बना डाला,,।। हा,, मुझे एक मजदूर बना डाला,,,मेरे इश्क़ ने तुझे,,,, कोहिनूर बना डाला,,।।,,,,,,,, संपादक
