भाई- और कसाई

वास्तविकता की परख

साहित्य

संपादक

5/3/20261 min read

छंद मुक्त कविता --- मेरा इश्क़ है मक्का,,, तेरा हुस्न मदीना है,,।। तेरे बग़ैर जिन्दगी,, जीना भी,, क्या जीना है,,।। ज़हर जुदाई का सनम,, जाने कब तक पीना है,,,।। अरब के ,,करोड़ों में ,, सिर्फ़ इक तू ही हसीना है ,,,।। मेरा इश्क़ है मक्का,, तेरा हुस्न मदीना है,,,।।। मगर जाने,, क्यों,, तुम्हे और मुझे,, देख कर लोग कहते हैं,,, कमबख्त,, इश्क़ बड़ा कसाई है ,, मेरा सनम,, बड़ा ,, हरज़ाई है,,,, जबकि ,, जग ज़ाहिर है,, आजकल ,, दुश्मन भाई--भाई है,,।।

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राजेश कुमार कर्मपथी उर्फ़ सम्राट शैदा सुलतान पूरी

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