आजकल की दुनियां

मन की व्यथा

साहित्य

संपादक

5/2/20261 min read

छंद मुक्त कविता --- कोई किसी का नहीं है,, इस जमाने,, में,, अगर कोई है तो,, सिर्फ़ अपने मतलब के लिए,, मतलबी दुनिया में ,,,मै भी,, मतलबी हूँ,,, अफसोस इस संसार में,, मेरे मतलब का कोई निकला ही,, नहीं,,, निकलता भी,,, कैसे,, सभी तो ,,,अपने - अपने मतलब में मगन हैं,,,, मै एक पत्थर की मूर्त्ति बनकर रह गया,,, अब बताओ पत्थर की मूर्त्ति में कहीं जान होती हैं,,, मै जिंदा रहकर भी,, बेजान हो गया,,, ईमान दारों की की दुनिया में बेईमान हो गया,,,,, बेवफा भगवान होते है,,,वो किसी की ,,जिन्दगी भर इच्छा ही नहीं पूरी कर पाते,, वैसे मैं भी हूँ,,,मै किसी के मतलब का नहीं,,,,, लोगों को ,,वही ,, लोग पसंद आते हैं,,, जो उनके मतलब के हो,,,