छंद मुक्त कविता
स्वप्न में श्री राम की अर्चना और दिन के उजाले में रावण की पूजा
साहित्य


मेरी ज़िन्दगी ने तुझको किताब बना डाला,
तेरी ज़िन्दगी ने मुझको शराब बना डाला।
वेद, पुराण, गीता और रामायण की उत्पत्ति हूँ मैं,
माता, ममता, करुणा, क्षमा, दया और प्रेम की मूर्ति थी मैं।
नव दुर्गा, काली, सीता, सती सावित्री थी मैं,
अपने जीवन में बहन, पुत्री, पत्नी, प्रेमिका,
पुत्रवधू का हर रूप मैंने बखूबी निभाया।
रचकर रचना तुलसी, मीरा, कालिदास और व्यास ने,
सारे जग को पढ़ाया—
ये सब बातें अब रातों के स्वप्न की बातें हैं।
इसे आप राम की अर्चना भी कह सकते हैं,
क्योंकि रात के स्वप्न में मैं सीता हूँ,
और दिन के उजाले में मैं लक्ष्मी हूँ।
त्रेता में सिर्फ एक रावण था,
कलयुग में मैं हजारों, करोड़ों, अरबों, खरबों रावणों को जन्म देती हूँ।
हाँ, मैं महालक्ष्मी हूँ।
एक महा उद्योगपति,
एक महा राजनीतिक नेता—
सुरा और सुंदरी का प्रयोग कर
पहले अपने मंतव्य पूरे करा लेते थे।
लेकिन अब समय की रूपरेखा बदल गई है।
हाँ, मैं महालक्ष्मी हूँ।
अब सब कुछ मुझमें ही शामिल है—
मैं ही मांस, मदिरा और सुंदरी हूँ,
काम, क्रोध, लोभ और मोह भी मैं ही हूँ।
मेरे मायाजाल में हर शख्स फँसा है।
आजकल कृष्ण को राधा नहीं चाहिए,
और राधा को भी कृष्ण नहीं चाहिए।
कलयुगी भारत ही नहीं,
समस्त संसार में—
हर एक आदमी को कॉलगर्ल चाहिए,
और हर एक नारी को कालबॉय चाहिए।
सुबह से शाम तक,
शाम से सुबह तक—
सबको रुपया और डॉलर चाहिए,
थोड़ा नहीं, बहुत चाहिए।
नेता को कुर्सी चाहिए,
और कुर्सी के लिए—
नेता जनता से कहते हैं (या यूँ कहें, करते हैं):
“तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें बर्बादी दूँगा।”
गरीब जनता को हर महीने पाँच किलो राशन चाहिए।
मेरा भारत विकास कर रहा है—
अजी, चुप रहिए!
हर सीता का बलात्कार हो रहा है।
ये बातें किसी से न कहना—
मैं लक्ष्मी ही सीता का एक रूप हूँ।
हाँ, मैं लक्ष्मी हूँ—
सब कुछ कर सकती हूँ।
मेरे बिना हर एक मर्द नामर्द है,
जिसकी लाठी, मैं उसी की भैंस हूँ।
हाँ, मैं न्याय हूँ—
अमीरों के पैरों की जूती हूँ।
कलयुग में हर एक राम मानसिक विकलांग है,
पागल है—
हर सीता का चीरहरण अब आम बात है।
धन्यवाद
